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My First Blog Post

Be yourself; Everyone else is already taken.

— Oscar Wilde.

This is the first post on my new blog. I’m just getting this new blog going, so stay tuned for more. Subscribe below to get notified when I post new updates.

वह बैठी थी

वह बैठी थी वह बैठी थी इक रास्ते धूप में हां धूप में बैठी थी किसी वास्ते

इक कपड़े में इज्जत समेटे छाती से बच्चे लपेटे वह बैठी थी हां बैठी थी इक रास्ते। चिड़चिड़ाती धूप में बैठी थी किसी वास्ते

था शरीर जर्जर उसका बच्चे भी उसके कुपोषित। भूख से वह लड़ रहे थे काया हो रही थी धरोहित

आंखों में था भरा समंदर । भरी थी पीड़ा उसके अंदर । हांथ पसारे मांग रही थी पेट की आग बुझाने को। मां की ममता बंधु देखो, । पेट भराया बच्चों का मिला जो उसको खाने को।

आर्येंद्र कुमार (पहला पृष्ठ)

अजीब से हैं लोग

मिली मुझे नसीहत जो मेरे कर्म में ही ना था , सोचा कुछ मिला कुछ जो मेरे धर्म में ही ना था । मगर वक्त ने मारी ऐसी करवट मिला जो मेरा सिर शर्म से ऊपर न उठा ॥

चीखता हूं अपनी हालातों पर मैं क्या करूं मिला ऐसा गम अपनों से,

जिसका कोई मरहम ना था ॥

अजीब से लोग हैं इस जहां में जो पूछते हैं मेरे गम को ,

कहते हैं कि हम तुम्हारे गम को बांटते हैं ।

पूछकर याद दिलाते पुरानी फिर खुद ब खुद हमको ही डांटते हैं ,

लगाते है मरहम सिर्फ नाम का सच पूछो तो जले पर नमक डालते हैं॥

अजीब से है लोग…………..

रिश्तो को समझने का क्या मुझ में हुनर नहीं या समझा ज्यादा अपना इन रिश्तो को कहीं वहीं तो मेरी भूल नहीं

करी मुहब्बत गुड़ से मीठी बनी कड़वी जो किसी को पसंद नहीं ।

यहाँ तो लोग पैसों के लिए जीते है मोहब्बत का तो कोई मोल नहीं

हो मेहरबां मुझपे ख़ुदा , भूलू गम होऊं ओझल , अब इस जहाँ को मुझसे सहा जाता नहीं।

कवि : आर्येन्द्र कुमार

ए बेवफा

इस जमाने की चाहत इन लोगों की आदत जो होती यह मुझको पता ,

ना रोता बिलखता न अश्क मेरे बहते ना होता मैं तुझ पर फिदा ।

Photo by Victor Freitas on Pexels.com

बेवफा हंसी अगर तूने दी ही ना होती काहे लेता मैं सपने सजा, ।

तू बताती तो सही कि तेरी हंसी नहीं बल्कि थी मेरी बदकिस्मत

थे दांत थोड़े बाहर, ना होती ये मुझसे खता

थी मीट्ठी सी बोली मिली चाहत की गोली ये शायर था तुझ पे फिदा

बाहर से तू मिट्ठी पर अंदर से कड़वी ,

ना चखता मैं तुझको गर देती तू मुझको बता ।।

मैं किस्मत टटोलूँ या खुद को झक्जोरू या पी ज़ाम भूलूँ जो तूने दी मुझको खता ।

कर अत्फ ऐ खुदा कहीं न बन जाऊँ मुफलिसी

जो लू मैं अपना जीवन मिटा ॥

ऐ बेवफ़ा –

ऐ बेवफ़ा –

कविः आर्येन्द्र कुमार

वक्त का खेल

वक्त का खेल ईशा अल्लाह किसी से कम नहीं ,वक्त के खेल से है किसी का मेल नहीं ।

किसी वक्त पर वह स्वच्छंद फैल रही थी हरियाली ,उसके ही सेवक माली ने आकार बनाने के कारण डाली डाली काट डाली ।

यह वक्त है जनाब किसी पर चूकता नहीं

वक्त पर क्या क्या नहीं देखा है ।

कल तक जो चिढ़ते थे गरीबों के साथ बात करने को ,आज उन्हें गरीबों की महफिल में बसे बैठ देखा है

कभी फेंका करते थे खाना कूड़ेदान में जो लोग उन लोगों को वही खाने पर झपटते देखा है।

कल तक हंसते थे जो लोग दूसरों की हालातों पर उनको हमने आज हालात ए गंभीर देखा है।

वक्त की थोड़ी सी चूक पर हमने रिश्तो को बिगड़ते देखा है तो कभी रिश्तों को संवरते देखा है ॥

कभी मां का बेघर हो जाना तो बच्चों को अनाथ होते देखा है।

कल तक लहराती थी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर आज उस किसान को खुदकुशी करते देखा है ॥

यह वक्त है जनाब

कवि: आर्येन्द्र कुमार

वक्त मेरे पंजे से दबा पड़ा है

दुनिया का हर शख्स वक्त का गुलाम है मिला जख्म जिस वक्त पर उसको वह वक्त अभी भी उसके जिगरे ज़मा है।

वक्त खेले इंसा से एक नुमाइश बच्चे की तरह वह बच्चा इस जहॉ में सबसे बड़ा है ।

कहे शायर फिज़ाओं की दिशा बदल कर सूरज के गोले को बर्फ में बदलकर

कि वक्त तेरे पंजे से दबा पड़ा, अकड़ा पड़ा है , जकड़ा पड़ा है तेरे पंजे के पिंजरे से अकड़ा पड़ा है।

अगर तू रोना धोना छोड़ दे मिले गम तो तू अश्क बहाना छोड़ दे ,

जहां की बातों को समेट मत बीती बातों को कुरेद मत ,

कर सफर तय अपना अवधूत बन, गौतम के जैसे अवधूत बन।

लेकर जिजीविषा जिगर में तू कालजयी तो बन ,बड़ा के वेग अपना तू फिज़ाओं से ।

करने मुकम्मल लक्ष्य को तू राह में अड़ा रहे।

वक्त तेरे पंजे से दबा पड़ा है अकड़ा पड़ा है तेरे पंजे के पिंजरे में जकड़ा पड़ा है। ।

कवि : आर्येन्द्र कुमार

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